Year: 2023
भारत का संविधान: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में क्या-क्या बदला?
दिनेश उप्रेती ‘संविधान चाहे जितना अच्छा हो, वह बुरा साबित हो सकता है, यदि उसका अनुसरण करने वाले लोग बुरे हों। यह कौन कह सकता है कि भारत की जनता और उसके दल कैसा आचरण करेंगे। अपना मकसद हासिल करने के लिए वे संवैधानिक तरीके अपनाएंगे या क्रांतिकारी तरीके? यदि वे क्रांतिकारी तरीके अपनाते हैं […]
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भारत का संविधान
हमारा उद्देश्य है कि हम अपने देश के सभी नागरिकों को अपने संविधान से अवगत कराएं ताकि हम अपने कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकें और अपने देश की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखें। इसी उद्देश्य से प्रारंभ किया जा रहा है संविधान का प्रकाशन। यह पहली किश्त है ‘भारतीय संविधान […]
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मौन
अमन कुमार बूढ़ा मोहन अब स्वयं को परेशान अनुभव कर रहा था। अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाना अब उसके लिए भारी पड़ रहा था। परिवार के अन्य कमाऊ सदस्य अपने मुखिया मोहन की अवहेलना करने लगे थे। मोहन की विधवा भाभी परिवार के सदस्यों की लगाम अपने हाथों में थामे थी। वह बड़ी चालाक थी। […]
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पं. पद्मसिंह शर्मा और ‘भारतोदय’
अमन कुमार ‘त्यागी’ पं. पद्मसिंह शर्मा का जन्म सन् 1873 ई. दिन रविवार फाल्गुन सुदी 12 संवत् 1933 वि. को चांदपुर स्याऊ रेलवे स्टेशन से चार कोस उत्तर की ओर नायक नंगला नामक एक छोटे से गाँव में हुआ था। इनके पिता श्री उमराव सिंह गाँव के मुखिया, प्रतिष्ठित, परोपकारी एवं प्रभावशाली व्यक्ति थे। […]
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क्रांति का बीजपत्र : आंचलिक पत्रकरिता
– अरविंद कुमार सिंह ‘‘खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।’’ गंगा-यमुना और सरस्वती के संगम की रेती से जब ये क्रांतिकारी पंक्तियां अकबर इलाहाबादी की शायरी से जनमानस के दिलों में उतर रही थीं; तो प्रयाग वैसा नहीं था, जैसा आज दिखता है। तीर्थराज की यह धरती […]
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भारतीय परिदृष्य में मीडिया में नारी चित्रण
डाॅ0 गीता वर्मा एसोसिऐट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, बरेली कालेज, बरेली। “नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में। पीयूशस्त्रोत सी बहा करो, अवनि और अम्बर तल में।।“ महिलाएं पत्रकारिता में मानवीय पक्ष को उजागर करती हैं। जय शंकर प्रसाद के अनुसार ‘नारी की करुणा अंतर्जगत का उच्चतम बिंब है जिसके बल […]
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आपात्काल, पत्रकारिता और साहित्यकार सन् 1975 से 1979 ई.
अमन कुमार तत्कालीन परिस्थितियाँ सच यही है कि यह दौर भारत के लिए अच्छा नहीं था। ‘‘यह वह दौर है जब देश आजादी के बाद के सबसे बुरे दौर से गुजरा। आजादी के सपनों का टूटना जो पिछले दशक में शुरू हुआ था वह यहाँ तक आते पूरी तरह बिखर गया। सत्ता में पहली बार […]
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आजादी आंदोलन – दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार और हिंदी पत्रकारिता
व्याख्यान – ऋषभदेव शर्मा सबसे पहले तो आपको इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के लिए इतना प्रासंगिक और विचारोत्तेजक विषय चुनने के लिए साधुवाद। इस विषय के स्पष्टतः तीन आयाम हैं। पहला आयाम है ‘आजादी आंदोलन’। दूसरा ‘दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार’। और तीसरा ‘दक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता’। मेरा विचार है कि ‘आजादी आंदोलन’ शब्द-युग्म बहुत […]
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स्वातंत्र्योत्तर हिंदी पत्रकारिता और साहित्यकार सन् 1948 से 1974 ई.
अमन कुमार तत्कालीन परिस्थितियाँ आजादी के बाद की पत्रकारिता के सामने कोई विशेष मुद्दा नहीं था। देश आजाद हो गया था। विधवा विवाह, बाल विवाह, शादी की उम्र क्या हो, सती प्रथा का विरोध-समर्थन, मुद्दों पर काफी लिखा जा रहा था और लिखना सार्थक भी रहा था। देश के नव-निर्माण, भविष्य की रूपरेखा पर फिलहाल […]
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