स्वाभिमान साहित्यिक मंच का 41वां राष्ट्रीय कवि दरबार: शब्दों का जादू और आज़ाद ग़ज़लों की गूंज

 

पटियाला। स्वाभिमान साहित्यिक मंच पटियाला द्वारा आयोजित 41वें राष्ट्रीय कवि दरबार ने साहित्य प्रेमियों को शब्दों के अद्भुत संसार में डुबो दिया। नरेश कुमार आष्टा की अध्यक्षता और संयोजकत्व में आयोजित इस कार्यक्रम का सफल संचालन जागृति गौड़ पटियाला ने किया, जबकि सिद्धेश्वर जी पटना ने कार्यक्रम की गरिमामयी अध्यक्षता की। भारत के विभिन्न राज्यों से आए साहित्यकारों ने अपनी कविताओं और ग़ज़लों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ पटियाला से कमल शर्मा जी द्वारा प्रस्तुत मनमोहक “हे! शारदे मां” ‘सरस्वती वंदना’ से हुआ, जिसने पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया। इसके बाद कमला शर्मा ने अपनी रचना ‘कुछ शब्द’ – “ना सूरत में जादू है, न नसीरत में जादू है, जो यहां तक खींच लाए वह तुम्हारे शब्दों का जादू है” सुनाकर खूब वाहवाही बटोरी और अपनी काव्य प्रतिभा का परिचय दिया। उत्तराखंड से भूपेंद्र सिंह देव ‘ताऊ जी’ ने अपनी कविता ‘कवि क्या कहता है’ – “कवि क्या कहता है, कवि क्या लिखता है, लिखता वही जो उसको दिखता है” के माध्यम से कवियों की मनोदशा और उनके लेखन के पीछे की प्रेरणा को बखूबी व्यक्त किया।
नोएडा से ग़ज़लों के बादशाह हजारी सिंह जी ने अपनी ग़ज़ल “दे गया दर्द वो ताउम्र रुलाने वाला, मुड़ के देखा भी नहीं छोड़ कर जाने वाला” को तरन्नुम के साथ गाकर महफिल लूट ली। उनकी सुरीली आवाज और शब्दों का जादू श्रोताओं के दिलों में उतर गया। नंदकुमार आदित्य जी ने महात्मा गांधी जी की पुण्यतिथि पर अपनी कविता ‘सत्य अहिंसा के पथ पर’ – “सत्य, अहिंसा और शांति का बापू ने संदेश दिया” सुनाकर सभी की आत्मा को विभोर कर दिया और राष्ट्रपिता के आदर्शों को याद दिलाया।
डॉ. मीना कुमारी परिहार ने ग़ज़ल “बिन तेरे ये अधूरी रही जिंदगी” और स्वाति चौरे ने “यह दिल हो गया तेरी एक मुलाकात में, वह याद आए हमको चांदनी रात में” सुनाकर श्रोताओं को भावुक कर दिया। इन गजलों ने प्रेम और विरह के विभिन्न रंगों को दर्शाया। वरिष्ठ ग़ज़लकार संतोष मालवीय ने नए और पुराने साल को याद करते हुए अपनी ग़ज़ल “कैसे गुजरा पिछला साल मत पूछिए, किस तरह हुए कंगाल मत पूछिए” सुनाकर नए वर्ष की शुभकामनाएं दीं और जीवन के अनुभवों को साझा किया।
राजप्रिया रानी ने अपनी कविता ‘चाहती हूं’ – “चाहूं मैं उन मनमौजी बारिश बन जाना, सीप के मोती सी ख्वाहिश बन जाना” से सपनों को उड़ान दी, जिसमें प्रकृति और आकांक्षाओं का सुंदर मेल था। वहीं डॉ. अनुज प्रभात ने अपनी ग़ज़ल “ये शहर ये गांव सिकार के शिकार हो रहे हैं, दम घुटती हैं हवाएं हम बेबस लाचार हो रहे हैं” से समाज की विसंगतियों और पर्यावरण प्रदूषण जैसे गंभीर मुद्दों पर प्रकाश डाला। प्रोफेसर शरद नारायण खरे जी ने वसंत पंचमी के उपलक्ष्य में एक सुंदर गीत “ये वसंत पावन मन हुआ निर्मल” प्रस्तुत किया, जिसने वसंत ऋतु की सुंदरता और पवित्रता को जीवंत कर दिया।
कार्यक्रम का सफल संचालन कर रही जागृति गौड़ जी ने कार्यक्रम में एक से बढ़कर एक शेर सुनाये और अपनी कविता “जीवन की कठिनाइयों ने मुझे जहां तक पहुंचाया है, इसलिए चलती रहती हूँ मेरे अंदर की शक्तियों से मुझे मिलवाया है, तभी तो मैं आगे बढ़ती रहती हूं” सुनाकर सभी को प्रेरित किया। उनके संचालन और काव्य प्रस्तुति ने कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए। अंत में, कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सिद्धेश्वर जी ने सभी रचनाकारों की रचनाओं की संक्षिप्त समीक्षा की और अपनी आज़ाद ग़ज़ल “उलझ गया हूं अब चाहता हूं सुलझना, अब रास नहीं आता गली-गली में भटकना” सुनाकर सभी को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया। उनकी ग़ज़ल ने जीवन की जटिलताओं और उनसे निकलने की इच्छा को व्यक्त किया।
यह कार्यक्रम स्वाभिमान साहित्य यूट्यूब चैनल पर लाइव प्रसारित किया गया, जिसे सैकड़ों दर्शकों ने बड़ी शिद्दत से देखा और सराहा। यह कवि दरबार एक मीठी याद बन गया, जिसने साहित्य और कला के प्रति प्रेम को और गहरा किया, साथ ही कवियों और श्रोताओं को एक मंच पर लाकर विचारों और भावनाओं का अद्भुत आदान-प्रदान किया।
प्रस्तुति _दुर्गेश मोहन
बिहटा, पटना (बिहार)

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