समावेशी साहित्य संस्थान के तत्वावधान में रविवार, 25 जनवरी 2026 को एक ऑनलाइन (आभासी) संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी का मुख्य विषय “हिंदी के साहित्येतिहास में इक्कीसवीं सदी: नामकरण की प्रासंगिकता” रहा, जिसमें देश के विभिन्न क्षेत्रों से विद्वानों और शोधार्थियों ने सहभागिता की।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता के बतौर डॉ० गंगा प्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर‘ (निदेशक, अंतरराष्ट्रीय अवधी अकादमी, लखनऊ) ने इक्कीसवीं सदी के साहित्य के स्वरूप और उसके उचित नामकरण की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि बदलती संवेदनाओं के दौर में 21वीं सदी के साहित्य को नए दृष्टिकोण से देखने की ज़रूरत है। इस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर आभासी श्रोताओं का ध्यानाकृष्ट किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. अखिलेश निगम ‘अखिल‘ (भा.पु.से., साहित्यकार एवं पुलिस महानिरीक्षक, उत्तर प्रदेश पुलिस) ने की।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने साहित्य के ऐतिहासिक कालखंडों के वर्गीकरण और वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उनकी प्रासंगिकता पर बल दिया। इस दौरान डॉ0 निगम ने कहा कि जहां वाद होता है, वहीं विवाद जन्म लेता है, इसलिए हमें समावेशी कालखंड के अंतर्गत वाद परंपरा से परे रहकर काम करना चाहिए, जहां हर प्रकार के उचित साहित्य को सम्मान मिले, भले ही वह दक्षिण भारत का हो या पूर्वोत्तर का। श्रीमती क्षिप्रा चौबीसा (शोधार्थी, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर) द्वारा स्वागत उद्बोधन के माध्यम से कार्यक्रम की शुरुआत की गई।
अंत में सुश्री शाईना शबनम (शोधार्थी, महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय, भरतपुर) ने संगोष्ठी के अध्यक्ष, मुख्य वक्ता, कार्यकारी समिति के अन्य विद्वानों तथा सभी श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन श्री उमेश कुमार प्रजापति ‘अलख’ (अनुवाद अधिकारी) ने किया। इस संगोष्ठी में मार्गदर्शक समिति से प्रो0 हरिशंकर मिश्र एवं डॉ0 सी. जयशंकर बाबु तथा परामर्श समिति से डॉ0 मोहन तिवारी आनंद एवं विधिक सलाहकार के बतौर डॉ0 सूर्य नारायण शूर की आभासी उपस्थिति रही। गूगल मीट पर आयोजित इस संगोष्ठी में कई आचार्य, सहायक आचार्य, शोधार्थी एवं अध्येताओं ने जुड़कर परिचर्चा का लाभ उठाया।
