डॉक्टर श्रीरंजन सूरिदेव

 

सरस्वती सारस्वत वरद पुत्र को, मेरा शत _शत नमन ।
आपने साहित्य से अगाध प्यार कर ,
किया साहित्य सृजन ।
साहित्य सृजित कर,
किया नाम रोशन ।
साहित्य जगत में ,
आपकी प्रतिभा थी,
विलक्षण ।
आपका नाम गूंजता कण_कण, आपथे सफल,
विद्वतजन ।
आपके प्रशंसक थे ,
सकल पाठकगण।
श्रीरंजन थे ,
साहित्य के लिए वरदान ।
जिससे भारतवर्ष ,
बना महान ।
आपका नाम था _श्रीरंजन, आपकी रचना थी _
मेघदूत एक अनुचिंतन ।
आपका उपनाम था _
सूरिदेव।
आप थे साहित्य के
आराध्य देव ।
आप थे ,
कई विषयों के विद्वान ।
आपका होता रहेगा ,
सर्वत्र योगदान।
आपको सफलता मिली ,
संपादन में ।
आपको सम्मान मिला ,
साहित्य सृजन में ।
आपसे पाठकों को मिलता, मनोरंजन और ज्ञान।
पाठकगण आपका करते ,
आदर और सम्मान ।
आपसे पाठकों को मिलता , असीम प्यार ।
आप हैं ,
हमारे प्यारे साहित्यकार ।
श्रीरंजन की वसुदेव हिंडी,
काफी प्रसिद्धि पाई ।
जन-जन के ज्ञान का,
अनुपम संदेश दिलाई ।
श्रीरंजन थे ,
अक्षर भारती के रचनाकार ।
आप थे ,
प्रतिभा संपन्न साहित्यकार ।
आप पर है ,
भारत को नाज।
आप देते हैं,
संबल आवाज ।
श्रीरंजन ,
कई पुरस्कार व सम्मान थे पाए ।आप भारतवर्ष की ,
शोभा में चार चांद थे लगाए।

 

दुर्गेश मोहन
बिहटा,पटना( बिहार)

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