Author: editor
जान बची तो लाखों पाएं
निमिषा सिंह हमारा देश वैसे तो हर क्षेत्र में विकास के पथ पर अग्रसर है लेकिन फिर भी स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से ही देश आर्थिक संकट से जूझ रहा है जिसका प्रमुख कारण है जनसंख्या में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि। परिणाम धरती पर अत्यधिक दबाव, बेरोजगारी, अन्न की कमी ,संसाधनों की कमी और […]
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हल्का होने का अहसास : मिलान कुंदेरा
श्रद्धांजलि लेख प्रो. गोपाल शर्मा “और जल्दी ही युवती सिसकी लेने के बजाय ज़ोर–ज़ोर से रोने लगी और वह यह करुणाजनक पुनरुक्ति दोहराती चली गई, ”मैं मैं हूँ, मैं मैं हूँ, मैं मैं हूँ ….” आज जब अचानक मिलान कुंदेरा के निधन का समाचार सुना तो उनकी एक कहानी के अनुवाद की ये अंतिम पंक्तियाँ याद […]
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सिसक रही सदी लिखो कवि/आदित्य आजमी
ग़ज़ल सिसक रही सदी लिखो कवि, सूख रही है नदी लिखो कवि! नेकी का तो पतन हो रहा है, बढ़ रही है बदी लिखो कवि! किसी दिन घर को गिरा देगी, ये बुनियादी नमी लिखो कवि! मंगल पर जाने की तैयारी है, कम पड़ती जमीं लिखो कवि! आधुनिकता के इस काल मे, गुम […]
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वैश्विक आतंकवाद पर आभासी चोट!
ऋषभदेव शर्मा शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के आभासी शिखर सम्मेलन की मेजबानी करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समुचित ज़ोर देकर वैश्विक आतंकवाद का मुद्दा उठाया। इसके महत्व और प्रासंगिकता से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब तक पाकिस्तान आतंकियों की पनाहगाह और चीन पाकिस्तान का सरपरस्त […]
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महान थे स्वामी विवेकानंद
निर्वाण दिवस पर शत्-शत् नमन कुमार कृष्णन स्वामी विवेकानंद के विचार और साधना में योग विद्या का बहुआयामी समन्वय है। ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रिवेणी उनके व्यक्तित्व से अविरल प्रवाहित होती है और राजयोग की पराकाष्ठा उनके जीवन को सूर्य की भांति दीप्तिमान बनाती है। विवेकानंद की मान्यता में ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की मौलिक धारणा […]
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विनोबा, राजेंद्र प्रसाद एवं शास्त्री जी की ईमानदारी पर उठ रहे सवाल: कहां तक जायज?
निमिषा सिंह चंद दिनों पहले गांधी शांति प्रतिष्ठान दिल्ली में वरिष्ठ गांधीवादी राजगोपाल जी द्वारा कहा गया एक वक्तव्य आज यथार्थ होता दिख रहा है “मौजूदा समय में सामाजिक काम करने वाले लोगों को देशद्रोही घोषित किया जा रहा है। हम सब अपनी जगह ढूंढ रहे हैं कि काम कैसे होगा? उसको तलाशने […]
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मानवीय समानता की संभावनाओं का उपहास उड़ाता यथार्थ
निमिषा सिंह बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर कहते थे “औरत किसी भी जाति की हो अपनी जाति में उसकी वही स्थिति होती है जो एक दलित औरत की समाज में”। मौजूदा समय में जहां गैर दलित स्त्रियां अपने अधिकारों के लिए पितृ सत्तात्मक समाज से लड़ रही हैं। आज भी दोयम दर्जे का जीवन जी रही […]
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लैंगिक असमानता की खाई पाटता भारत
-अरविंद जयतिलक विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) की वार्षिक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट, 2023 सुखद और राहतकारी है कि लैंगिक समानता के मामले में भारत का स्थान 146 देशों में 127 वां हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वर्ष की तुलना में आठ स्थान का सुधार हुआ है। पिछले वर्ष भारत 146 देशों की सूची […]
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टमाटर को बुखार!
✍️ ऋषभदेव शर्मा पूरे भारत में टमाटर की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी चिंता का कारण है। कुछ स्थानों पर टमाटर की कीमत दोगुनी से भी अधिक हो गई है, जिससे आम लोगों के लिए टमाटर खरीदना मुश्किल हो गया है। शुक्र है कि आम चुनाव अभी दूर है वरना टमाटर का यह बुखार कभी […]
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‘नौकरस्याही के रंग’ पुस्तक जो जोड़ती है अपने से
डॉ. कन्हैया त्रिपाठी पुस्तकें मनुष्य की कई पहेलियों को शांत कर देती हैं और पाठक पर अपनी एक नई छाप छोड़ देती हैं, बस पाठ करने वाला व्यक्ति उसकी संवेदना को मनोयोग से समझ भर पाए। लेखक की संवेदना को पकड़ पाए। पुस्तक जिस भावभूमि पर रची जाती है, उसे पाठक तभी उसी रूप में […]
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